Upsc के कुछ ऐसे प्रश्न जो ज्यादातर परीक्षामें देखने को मिलता है रट लो या फिर याद कर लो इसे ।।

प्रश्न. किसी स्थान विशेष पर किसी उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले प्रमुख औद्योगिक कारकों की चर्चा करें तथा भारत के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को संदर्भित करते हुए व्याख्या करें।

उत्तर.

उत्तर की रूपरेखा:

भारत में किसी उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले प्रमुख औद्योगिक कारकों के बारे में बताएं।
प्रमुख भौगोलिक कारकों की उदाहरण सहित चर्चा करते हुए गैर-भौगोलिक कारकों का भी संक्षेप में उल्लेख करें।
उद्योगों की अवस्थिति अनेक कारकों से प्रभावित होती है। इनमें कच्चे माल की उपलब्धि, ऊर्जा, बाज़ार, पूंजी, परिवहन, श्रमिक आदि प्रमुख हैं। इन कारकों का सापेक्षिक महत्त्व समय, स्थान, आवश्यकता, कच्चे माल और उद्योग के प्रकार के अनुसार बदलता है तथापि आर्थिक दृष्टि से विनिर्माण उद्योग वही स्थापित किये जाते हैं, जहाँ उत्पादन लागत तथा निर्मित वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की लागत सबसे कम हो। परिवहन लागत, काफी हद तक कच्चे माल और निर्मित वस्तुओं के स्वरूप पर निर्भर करती है।

पूर्णतया भौगोलिक कारकों के अतिरिक्त ऐतिहासिक, राजनैतिक तथा आर्थिक तत्त्व भी उद्योगों के स्थानीयकरण को प्रभावित करते हैं। कई बार ये तत्त्व भौगोलिक कारकों से अधिक प्रभावशाली होते हैं।

उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों को दो भागों में बाँटा जा सकता है।

भौगोलिक कारक – इसके अंतर्गत निम्नलिखित तत्त्वों को शामिल किया जाता है-

(a) कच्चा माल- उद्योग सामान्यतः वहीं स्थापित किये जाते हैं जहाँ कच्चे माल की उपलब्धता होती है। जिन उद्योगों में निर्मित वस्तुओं का भार, कच्चे माल की तुलना में कम होता है, उन उद्योगों को कच्चे माल के निकट ही स्थापित करना होता है। जैसे- चीनी उद्योग। गन्ना भारी कच्चा माल है जिसे अधिक दूरी तक ले जाने से परिवहन की लागत बहुत बढ़ जाती है और चीनी के उत्पादन मूल्य में वृद्धि हो जाती है।

लोहा और इस्पात उद्योग में उपयोग में आने वाले लौह-अयस्क और कोयला दोनों ही वज़न ह्यस और लगभग समान भार के होते हैं। अतः अनुकूलनतम स्थिति कच्चा माल व स्रोतों के मध्य होगी जैसे जमशेदपुर।

शक्ति (ऊर्जा) – उद्योगों में मशीन चलाने के लिये शक्ति की आवश्यकता होती है। शक्ति के प्रमुख स्रोत- कोयला, पेट्रोलियम, जल-विद्युत, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा है। लौह-इस्पात उद्योग कोयले पर निर्भर करता है, इसलिये यह उद्योग खानों के आस-पास स्थापित किया जाता है। छत्तीसगढ़ का कोरबा तथा उत्तर प्रदेश का रेनूकूट एल्युमीनियम उद्योग विद्युत शक्ति की उपलब्धता के कारण ही स्थापित हुए हैं।

श्रम- स्वचालित मशीनों तथा कंप्यूटर युग में भी मानव श्रम के महत्त्व को प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। अतः सस्ते व कुशल श्रम की उपलब्धता औद्योगिक विकास का मुख्य कारक है।

जैसे- फिरोजाबाद में शीशा उद्योग, लुधियाना में होजरी तथा जालंधर व मेरठ में खेलों का सामान बनाने का उद्योग मुख्यतः सस्ते कुशल श्रम पर ही निर्भर है।

परिवहन एवं संचार- कच्चे माल को उद्योग केंद्र तक लाने तथा निर्मित माल की खपत के क्षेत्रों तक ले जाने के लिये सस्ते एवं कुशल यातायात की प्रचुर मात्रा में होना अनिवार्य है। मुम्बई, चेन्नई, दिल्ली जैसे महानगरों में औद्योगिक विकास मुख्यतः यातायात के साधनों के कारण ही हुआ है।

बाज़ार- औद्योगिक विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका तैयार माल की खपत के लिये बाज़ार की है।

सस्ती भूमि और जलापूर्ति- उद्योगों की स्थापना के लिये सस्ती भूमि का होना भी आवश्यक है। दिल्ली में भूमि का अधिक मूल्य होने के कारण ही इसके उपनगरों में सस्ती भूमि पर उद्योगों ने द्रुत गति से विकास किया है।

उपर्युक्त भौगोलिक कारकों के अतिरिक्त पूंजी, सरकार की औद्योगिक नीति, औद्योगिक जड़त्व, बैंकिग तथा बीमा… आदि की सुविधा ऐसे गैर-भौगोलिक कारक हैं जो किसी स्थान विशेष में उद्योगों की स्थापना को प्रभावित करते हैं।

 

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प्रश्न:2  ऊर्जा के परंपरागत एवं गैर परम्परगत श्रोतों की चर्चा करें
FOR mains GS

परंपरागत ऊर्जा के स्रोत

कोयला – भारत में कोयला बहुतायात में पाया जाने वाला जीवाश्म ईंधन है। यह देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का महत्त्वपूर्ण भाग प्रदान करता है। इसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन तथा उद्योगों और घरेलू शरूरतों के लिए उफर्जा की आपूर्ति के लिए किया जाता है। भारत अपनी वााणिज्यिक ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मुख्यतः कोयले पर निर्भर है। कोयले का निर्माण पादप पदार्थों वेफ लाखों वर्षों तक संपीडन से हुआ है। इसीलिए संपीडन की मात्रा, गहराई और दबने के समय के आधार पर कोयला अनेक रूपों में पाया जाता

पेट्रोलियम – भारत में ऊर्जा का दूसरा प्रमुख साधन पेट्रोलियम या खनिज तेल है। यह ताप व प्रकाश के लिए ईंधन, मशीनों को स्नेहक और अनेक विनिर्माण उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करता है। तेल शोधन शालाएँ संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा असंख्य रासायन उद्योगों में
एक नोडीय बिंदु का काम करती हैं।

भारत में अधिकांश पेट्रोलियम की उपस्थिति तृतीयक युग की शैल संरचनाओं के अपनति व भ्रंश ट्रैप में पाई जाती है। वलन, अपनति और गुंबदों वाले प्रदेशों में यह वहाँ पाया जाता है जहाँ उद्ववलन के शीर्ष में तेल ट्रैप हुआ होता है।

तेल धारक परत संरध्र चूना पत्थर या बालुपत्थर होता है जिसमें से तेल प्रवाहित हो सकता है।
मध्यवर्ती असरंध्र परतें तेल को उफपर उठने व नीचे रिसने से रोकती हैं।
पेट्रोलियम संरध्र और असरंध्र चट्टानों के बीच भ्रंश ट्रैप में भी पाया जाता है। प्राकृतिक गैस हल्की होने के कारण खनिज तेल के ऊपर पाई जाती है।
भारत में कुल पेट्रोलियम उत्पादन का 63 % भाग मुंबई से, 18 % गुजरात से और 16 % असम से प्राप्त होता है।

प्राकृतिक गैस – एक महत्त्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा संसाधन है जो पेट्रोलियम के साथ अथवा अलग भी पाई जाती है। इसे ऊर्जा के एक साधन के रूप में तथा पेट्रो रासायन उद्योग के एक औद्योगिक कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाता है।

कार्बनडाई-आॅक्साइड के कम उत्सर्जन के कारण प्राकृतिक गैस को पर्यावरण-अनुकूल माना जाता है। इसलिए यह वर्तमान शताब्दी का ईंधन है। कृष्णा-गोदावरी नदी बेसिन में प्रावृफतिक गैस के विशाल भंडार खोजे गए हैं। पश्चिमी तट के साथ मुम्बई
और सन्निध क्षेत्रों को खंभात की खाड़ी में पाए जाने वाले तेल क्षेत्रा संपूरित करते हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रा हैं जहाँ प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार पाए जाते हैं।

गैर-परंपरागत ऊर्जा के साधन

ऊर्जा के बढ़ते उपभोग ने देश को कोयला, तेल और गैस जैसे – जीवाश्मी ईंधनों पर अत्यधिक निर्भर कर दिया है। गैस व तेल की बढ़ती कीमतों तथा इनकी संभाव्य कमी ने भविष्य में ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा के प्रति अनिश्चितताएँ उत्पन्न कर दी हैं। इसके राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की ऊर्जा पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त जीवाश्मी ईंधनों का प्रयोग गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न करता है। अतः नवीकरण योग्य ऊर्जा संसाधनों जैसे –

सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैविक ऊर्जा तथा अवशिष्ट पदार्थ जनित ऊर्जा , परमाणु (आणविक) ऊर्जा, तापीय ऊर्जा उपयोग की बहुत जरुरत है। ये ऊर्जा के गैर-परंपरागत साधन कहलाते हैं।

रैट होल (Rat Hole) – भारत में अधिकांश खनिज राष्ट्रीयकृत हैं और इनका निष्कर्षण सरकारी अनुमति के पश्चात् ही सम्भव है, किन्तु उत्तर-पूर्वी भारत के अधिकांश जनजातीय क्षेत्रों में, खनिजों का स्वामित्व व्यक्तिगत व समुदायों को प्राप्त है। मेघालय में कोयला, लौह अयस्क, चूना पत्थर व डोलोमाइट के विशाल निक्षेप पाए जाते हैं। जोवाई और चेरापूंजी में कोयले का खनन परिवार के सदस्य द्वारा एक लंबी संकीर्ण सुरंग के रूप में किया जाता है, जिसे रैट होल खनन कहते हैं।

भारत की जलवायु को सचित्र समझाइये।
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भारत की जलवायु को मानसूनी जलवायु कहा जाता है। एशिया में इस प्रकार की जलवायु मुख्यतः दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व में पाई जाती है।भारत की जलवायु सामान्य प्रतिरूप में लगभग एकरूपता होते हुए भी देश की जलवायु-अवस्था में स्पष्ट प्रादेशिक भिन्नताएँ हैं। जैसे – गर्मियों में, राजस्थान वेफ मरुस्थल में कुछ स्थानों का तापमान लगभग 50॰C तक पहुँच जाता है, जबकि जम्मू-कश्मीर वेफ पहलगाम में तापमान लगभग 20॰C रहता है। सर्दी की रात में, जम्मू-कश्मीर में द्रास का तापमान -45॰C तक हो सकता है, जबकि तिरुवनंतपुरम में यह 22॰C हो सकता है।

जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
पृथ्वी की गोलाई के कारण, इसे प्राप्त सौर ऊर्जा की मात्रा अक्षांशों के अनुसार अलग-अलग होती है। इसके परिणामस्वरूप तापमान विषुवत वृत्त से ध्रुवों की ओर सामान्यतः घटता जाता है। किसी भी क्षेत्र की जलवायु को नियंत्रित करने वाले छः प्रमुख कारक हैं –

अक्षांश,
तुंगता (ऊँचाई)
वायु दाब एवं पवन तंत्र
समुद्र से दूरी
महासागरीय धाराएँ
उच्चावच लक्षण।

भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

अक्षांश

कर्क वृत्त देश के मध्य भाग, पश्चिम में कच्छ के रन से लेकर पूर्व में मिजोरम, से होकर गुजरती है। देश का लगभग आधा भाग कर्वफ वृत्त वेफ दक्षिण में स्थित है, जो उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रा है। कर्वफ वृत्त वेफ उत्तर में स्थित शेष भाग उपोष्ण कटिबंधीय है। इसलिए भारत की जलवायु
में उष्ण कटिबंधीय जलवायु एवं उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु दोनों की विशेषताएँ उपस्थित हैं।

ऊँचाई

भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 6,000 मीटर है। भारत का तटीय क्षेत्र भी विशाल है, जहाँ अधिकतम ऊंचाई लगभग 30 मीटर है। हिमालय मध्य एशिया से आने वाली ठंडी हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करने से रोकता है। इन्हीं पर्वतों के कारण इस क्षेत्र में मध्य एशिया की तुलना में ठंड कम पड़ती है।

भारत में जलवायु तथा संबंधित मौसमी अवस्थाएँ निम्नलिखित वायुमंडलीय अवस्थाओं से संचालित होती हैं:
वायु दाब एवं धरातलीय पवनें
ऊपरी वायु परिसंचरण तथा पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभ एवं उष्ण कटिबंधीय चक्रवात भारत उत्तर-पूर्वी व्यपारिक पवनो वाले क्षेत्र में स्थित है , ये पवनो उत्तरी गोलार्ध के उपोष्ण-कटिबंधी उच्च दाब पट्टीयो से उत्पन्न होती है , ये दक्षिण की ओर बहती है और कोरिओलिस बल के कारण दाहिनी और विक्षेपित होकर विषुवतीय निम्न दाब वाले क्षेत्रों की और बढ़ती है समान्तयः इन पवनो में नमी की मात्रा बहुत कम होती है क्योंकि ये स्थलीय भागों पर उतपन्न होती है एव बहती है, इसलिए इन पवनो द्वारा वर्षा कम या नहीं होती है

भारत की वायु दाब एवं पवन तंत्र अद्वितीय है। शीत ऋतु में, हिमालय के उत्तर में उच्च दाब होता है। इस क्षेत्र की ठंडी शुष्क हवाएँ दक्षिण में निम्न दाब वाले महासागरीय क्षेत्र के ऊपर बहती हैं। ग्रीष्म ऋतु में, आंतरिक एशिया एवं उत्तर-पूर्वी भारत के ऊपर निम्न दाब का क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इसके कारण गर्मी के दिनों में वायु की दिशा पूरी तरह से परिवर्तित हो जाती है। वायु दक्षिण में स्थित हिंद महासागर के उच्च दाब
वाले क्षेत्रा से दक्षिण-पूर्वी दिशा में बहते हुए विषुवत् वृत्त को पार कर दाहिनी ओर मुड़ते हुए भारतीय उपमहाद्वीप पर स्थित निम्न दाब की ओर बहने लगती हैं। इन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों के नाम से जाना जाता है। ये पवनें कोष्ण महासागरों के ऊपर से बहती हैं, नमी ग्रहण करती हैं तथा भारत की मुख्य भूमि पर वर्षा करती हैं।

इस प्रदेश में, ऊपरी वायु परिसंचरण पश्चिमी प्रवाह के प्रभाव में रहता है। इस प्रवाह का एक मुख्य घटक जेट धारा है।

जेट धाराएँ लगभग 27॰ – 30॰ उत्तर अक्षांशों के बीच स्थित होती हैं, इसलिए इन्हें उपोष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट धाराएँ कहा जाता है। भारत में, ये जेट धाराएँ ग्रीष्म ट्टतु को छोड़कर पूरे वर्ष हिमालय वेफ दक्षिण में प्रवाहित हाती हैं। इस पश्चिमी प्रवाह के द्वारा देश के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भाग में पश्चिमी चक्रवाती विक्षोभ आते हैं। गर्मियों में, सूर्य की आभासी गति के साथ ही उपोष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट धारा हिमालय
के उत्तर में चली जाती है। एक पूर्वी जेट धारा जिसे उपोष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट धारा कहा जाता है गर्मी के महीनों में प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर लगभग 14॰ उत्तरी अक्षांश में प्रवाहित होती है।
अन्य महत्वपूर्ण परिभाषा

जेट धरा :-

ये एक संकरी पट्टी में स्थित क्षोभमंडल में अत्यधिक उँफचाई ;12,000 मीटर से अधिकद्ध वाली पश्चिमी हवाएँ होती हैं। इनकी गति गर्मी में 110 कि॰मी॰ प्रति घंटा एवं सर्दी में 184 कि॰मी॰ प्रति घंटा होती है। बहुत-सी अलग-अलग जेट धाराओं को पहचाना गया है। उनमें सबसे स्थिर मध्य अक्षांशीय एवं उपोष्ण कटिबंधीय जेट धाराएँ हैं।

पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभ :-

सर्दी के महीनों में उत्पन्न होने वाला पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभ भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आने वाले पश्चिमी प्रवाह के कारण होता है। वे प्रायः भारत के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। उष्ण कटिबंधीय चक्रवात मानसूनी महीनों के साथ-साथ अक्टूबर एवं नवंबर के महीनों में आते है तथा ये पूर्वी प्रवाह के एक भाग होते हैं एवं देश के तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं।

 

Source : NCERT

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॥सामान्य अध्ययन॥

~ पेपर – 2

प्रश्न3. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना क्या है? इसके परिप्रेक्ष्य में बताइये कि केरल के संदर्भ में विदेशी सहायता स्वीकार न करना कहाँ तक उचित है?
उत्तर.

उत्तर की रूपरेखा

प्रभावी भूमिका में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना को स्पष्ट करें।
तार्किक एवं संतुलित विषय-वस्तु में योजना के प्रावधानों की चर्चा करते हुए केरल के संदर्भ में विदेशी सहायता स्वीकार न करने के औचित्य को स्पष्ट करें ।
प्रश्नानुसार संक्षिप्त एवं सारगर्भित निष्कर्ष लिखें।
प्रधानमंत्री ने मई 2016 में राष्‍ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (NDMP) जारी की जो देश की पहली इस तरह की राष्‍ट्रीय योजना है। एनडीएमपी आपदा जोखिम घटाने के लिये सेंदाई फ्रेमवर्क में तय किये गए लक्ष्‍यों और प्राथमिकताओं के साथ मोटे तौर पर तालमेल स्थापित करता है।

योजना का विज़न

भारत को आपदा मुक्‍त बनाने के साथ ही आपदा जोखिमों में पर्याप्‍त रूप से कमी लाना व जान-माल, आजीविका और संपदाओं जैसे- आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक और पर्यावरणीय नुकसान को कम करना आदि।
इसके लिये प्रशासन के सभी स्तरों और साथ ही समुदायों की आपदाओं से निपटने की क्षमता को बढ़ाया जाएगा।
प्रत्‍येक खतरे के लिये सेंदाई फ्रेमवर्क में घोषित चार प्राथमिकताओं को आपदा जोखिम में कमी करने के फ्रेमवर्क में शामिल किया गया है।
इसके कार्यक्षेत्र हैं : जोखिम को समझना, एजेंसियों के बीच सहयोग, डीआरआर में सहयोग- संरचनात्‍मक व गैर-संरचनात्‍मक उपाय, क्षमता विकास।
एनडीएमपी के ‘अंतर्राष्ट्रीय सहयोग’ पर अध्याय के प्रासंगिक खंड में लिखा गया है कि नीति के मामले में भारत सरकार आपदा के चलते विदेशी सहायता के लिये कोई अपील जारी नहीं करती है।
हालाँकि, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना का अध्याय 9 स्वीकार करता है कि समय-समय पर गंभीर आपदाओं की दशा में एक विदेशी सरकार द्वारा दी गई स्वैच्छिक सहायता स्वीकार की जा सकती है।
दरअसल, यह योजना बताती है कि आपदा के चलते भारत विदेशी सहायता के लिये अपील नहीं करेगा किंतु एक अन्य देश की राष्ट्रीय सरकार स्वैच्छिक रूप से आपदा पीड़ितों के लिये एकजुटता में सद्भावना के रूप में सहायता प्रदान करती है तो केंद्र सरकार प्रस्ताव स्वीकार कर सकती है।
केरल में आई भयावह बाढ़ ने देश-दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है और इस बाढ़ की विभीषिका का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर ‘गंभीर श्रेणी की आपदा’ घोषित किया गया है। इसके साथ ही केरल में राहत, बचाव एवं पुनर्निर्माण कार्यों के लिये केंद्र सरकार ने अब तक राज्य को हरसंभव सहायता प्रदान की है। आपदा के दौरान भारत के विभिन्न राज्यों ने आगे बढ़कर आर्थिक सहायता मुहैया करवाई इसके साथ ही दुनिया के विभिन्न देशों ने भी आर्थिक सहायता की पेशकश की है। जिसमें संयुक्त अरब अमीरात से लगभग ₹ 700 करोड़ तथा मालदीव ने लगभग ₹ 35 लाख तक की आर्थिक सहायता की पेशकश की है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने केरल के बाढ़ प्रभावित इलाकों में मदद हेतु एक कमेटी बनाने की भी घोषणा की है।

केरल में राहत और पुनर्वास कार्यों के लिये भारत ने विदेशी सरकारों से वित्तीय सहायता के प्रस्तावों को अपनाए जाने से इनकार कर दिया है जिसने केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक विवाद उत्पन्न कर दिया है क्योंकि केंद्र सरकार मौजूदा नीति के अनुरूप घरेलू प्रयासों के माध्यम से ही केरल में आवश्यकताओं को पूरा करना चाहती है । इस विवाद को बहुआयामी रूप में देखने की आवश्यकता है। निःसंदेह केरल गंभीर आपदा से जूझ रहा है और उसके लिये इस समय छोटी वित्तीय सहायता भी मायने रखती है, किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि केंद्र सरकार ने प्रारंभ से ही इस विपत्ति में केरल की हरसंभव सहायता की है। इसके अलावा इस कठिन परिस्थिति में समूचा देश केरल की यथासंभव सहायता कर रहा है।

हालाँकि, किसी अन्य देश से सहायता लेना भले ही नियमों के अनुसार गलत न हो, किंतु जब सरकार को लगता है कि यह विपत्ति उसके सामर्थ्य से बाहर नहीं हैं तो इस स्थिति में हमें धैर्य का परिचय देने की आवश्यकता है। इसके अलावा यह मुद्दा विश्व में भारत की साख से जुड़ा हुआ है और जल्दीबाजी में लिया गया कोई भी निर्णय भारत की छवि को नुकसान पहुँचा सकता है।

 

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